विज्ञापन

शूर, सुर, सूर

Anil Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            शूर वही, जो सत्य-पंथ पर,
        
                                                    
                            
हँसकर शीश चढ़ाए।
संकट चाहे लाख खड़े हों,
पग पीछे न जाए।*

सुर वह, जिसकी मधुर तान से,
मन का तम मिट जाए।
सूखे अधरों पर मुस्कानें,
जीवन-गीत सुनाए।

सूर भले ही नयन-विहीन हो,
दुनिया को समझाए।
बाह्य-नयन जब राह न देखें,
अंतर-दीप दिखाए।

*शूर बने तो कर्म पवित्र हों,*
*सुर बने तो देवत्व मन।*
*सूर बने तो अंतर्दृष्टि से—*
*जग हो ज्योतिर्मय धन।*

शब्द तीन हैं, अर्थ अनोखे,
भाव मगर एक—
शूर हृदय हो, सुरमय जीवन,
सूर-दृष्टि हो नेक।
-पंडित अनिल
एक महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all