शूर वही, जो सत्य-पंथ पर,
हँसकर शीश चढ़ाए।
संकट चाहे लाख खड़े हों,
पग पीछे न जाए।*
सुर वह, जिसकी मधुर तान से,
मन का तम मिट जाए।
सूखे अधरों पर मुस्कानें,
जीवन-गीत सुनाए।
सूर भले ही नयन-विहीन हो,
दुनिया को समझाए।
बाह्य-नयन जब राह न देखें,
अंतर-दीप दिखाए।
*शूर बने तो कर्म पवित्र हों,*
*सुर बने तो देवत्व मन।*
*सूर बने तो अंतर्दृष्टि से—*
*जग हो ज्योतिर्मय धन।*
शब्द तीन हैं, अर्थ अनोखे,
भाव मगर एक—
शूर हृदय हो, सुरमय जीवन,
सूर-दृष्टि हो नेक।
-पंडित अनिल
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