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कुल और कूल

Anil Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            *कुल और कूल*
        
                                                    
                            

कुल है पुरखों की पहचान,
कूल नदी का शांत किनारा,
एक सँजोए बीते युग को,
एक बने बहती धारा।

कुल से मिलता मान विरासत,
कर्म उसे विस्तार दें,
कूल थाम ले चंचल लहरें,
गति को नूतन पार दें।

नाम मिला तो बात न पूरी,
नाम तभी जब कर्म खिले,
वंश तभी गौरव कहलाए,
जब उसके दीपक धर्म जले।

तट की अपनी मौन तपस्या,
लहरों का अविराम सफर,
एक ठहरने का आश्रय दे,
दूजा बढ़ने का सुंदर स्वर।

अक्षर थोड़ा भेद रचते हैं,
अर्थ मगर संसार रचे—
एक जड़ों से जोड़ रहा है,
दूजा जीवन-पार रचे।

जन्म मिले तो वंश मिले बस,
मान मिले सत्कर्मों से;
जीवन का सौंदर्य निखरता,है
सच्चे संबंधों से।

नाम रहे पीढ़ी-दर-पीढ़ी,
यश रहे व्यवहार में;
और किसी की थकी हुई धारा
ठहर सके अपने प्यार में।
-पंडित अनिल
एक महीने पहले
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