तर्पण
आज अंजलि में जल लेकर,
आँखों में सागर भर आया,
जिनको कल तक पास समझा था,
आज उन्हें स्मरण में पाया।
सूना आँगन, मौन दहलीज़ें,
अब भी तुम्हें पुकारती हैं,
दीवारों पर ठहरी परछाईं,
बीती बातें कहती हैं।
तुम थे तो घर, घर लगता था,
तुम बिन सब कुछ सूना है,
हँसी तुम्हारी ढूँढ़ रही है
मन का हर कोना-कोना है।
जिन हाथों ने उँगली थामी,
चलना हमको सिखलाया,
आज उन्हीं चरणों की स्मृति ने
मन को है चुपके से रुलाया।
तर्पण की इस छोटी अंजलि में
कितना गहरा प्यार भरा है,
जल तो बहता दूर नदी में,
मन अब भी तुमसे जुड़ा है।
जो शब्द कभी कह नहीं पाए,
आज वही आँसू कहते हैं,
तुमसे बिछड़े वर्षों बीते,
फिर भी तुम दिल में रहते हैं।
हे पितरों! स्वीकार करो यह
नयनों का मौन समर्पण,
जल की धारा के संग बहता
जीवन भर का यह तर्पण।
जब तक स्मृति शेष रहेगी,
तुम भी हममें जीवित हो,
हमारी हर साँस के भीतर
एक अनकही कविता हो।
-पंडित अनिल