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मां की ममता का विसर

Anil Jadhav

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मां की ममता ईश्वर का वरदान है।
        
                                                    
                            
सच पूछो तो मन इंसान नहीं भगवान है।
इसी प्रकार वह मुसीबत में एक नई राह होती है।

जिंदगी की कड़ी धूप में छाया मुझ पर किए।
खड़ी रहती है सदा मां मेरे लिए।
मां की ममता का विसर पडना समझ ले ए इंन्सान
तेरी जिंदगी अर्धविरहित रहेगी वरना।

मां के तव- शरीर पर जख्म पहुंचाएगा इधर
ईश्वर तेरे पाप का घड़ा भरेगा उधर।
नासमझ तू समझ नहीं सकता
तेरा पाप पवित्र नदी के गंगाजल से भी धूल नहीं सकता।

तुने जो उंगली उठाई है मां के आचरण पर।
तू पछताएगा अपने जीवन के विचलन पर।
मां के स्तन के दूध से तुझे बल मिला है।
और तू कहता है कि मुझे मेरा नया कल मिला है।

तूने उठाया हैं मां के तन पर अपना वे हाथ।
निश्चित यही है कि तू बिलबिलाएगा मां के चरणों के साथ।
मृत्यु के सागर से तुझे दूर हटाए।
इसी कारण तूने उसे ही दुखाया।

मां के इस आंचल में पूरा ब्रह्मांड समाया है।
तू क्या समझेगा तूने तो अपना चरित्र ही गमवाया है।
सुनकर अपनी पत्नी की भाषा क्या तू भूल गया मां की नई अभिलाषा।
मां की कोख से तूने जन्म लेकर यह विश्व दर्शित किया है।
इसी कारण तूने अपनी मां को ही वंचित किया है।
पत्नी की वाणी तुझे मधुर संगीत लगे।
मां की बोली तुझे बेसुरो का बेसुरा गीत लगे।

ईश्वर रूपी मां को तूने न अपनाया।
ईश्वर करे तुझे दुखों के अग्नि में ही भुनवाया।
गाता रहा गुनगुनाता रहा पत्नी के ही गान।
कभी देखा था मां के अंतर्गत का अभियान।
थोड़ा कर सत्य विचारों का ग्रहण।
नहीं तो करेगा तू ही अपनी मां का धर हरण।

अपने कर्तव्य का तू शिखर उठाले।
अपनी मां को तू अपने दिल से लगा ले।
अगर हो जाए मां की ममता का विसर।
सच यही है खो जाएगा तू विपत्तियों के घर।

लेखक: अनिल जाधव
एक वर्ष पहले
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