हवाएँ, तूफ़ानों का रूप लेकर,
बगीचों को तहस-नहस कर देती हैं...
फूलों-पत्तों को झकझोर, सब अलग कर
देती हैं...
शांत होने पर वही हवाएँ सवाल
करती हैं,
न बगीचों की खूबसूरती बची, न
इत्र घुला फूलों का हवाओं में...
सब जानते हुए भी हवाएँ नादान
बनती हैं,
न जाने क्या सोच उन फूलों और
एक शब्द औषधि करें एक शब्द करें घाव ।