छँट जाएँगे मेघ काल के
स्वच्छ सृष्टि अम्बर तल होगा
तिमिरपूर्ण घन रातों में भी
आलोक चन्द्र का उज्ज्वल होगा,
जो सूख गए जीवन तरु हैं
उनमें भी पत्तियाँ आएँगी
गुलशन के सुन्दर फूलों में भी
नव कलियाँ खिल जाएँगी...।
रोग शोक से मुक्ति मिलेगी
व्याधिरहित जनजीवन होगा
शूल भरे दुर्गम पथ पर भी
सुख का मनमोहक सुमन खिलेगा,
दुःखपूर्ण मनुज के जीवन में
खुशियों की बेला आएगी
प्रकृति के सूने आँगन में
फिर से हरियाली छाएगी...।
वसुधा की पावन गोदी में
मानवता का नव बीज उगेगा
उपजेगी भावना परहित की
मानव मानव में प्रेम बढ़ेगा,
यह सुरभिरहित जीवन वन में
फिर प्रीति गंध फैलाएगी
फिर से महकेगा चमन
बहारें फिर से आएँगी...।
-आनंद प्रताप सिंह
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