हे मातृभूमि, हे देवभूमि!
हे हिन्द की भाग्यविधाता
दुश्मन खड़ा शीश है ताने
जागो हे श्री ध्वजाधारिणी
जागो हे भारत माता।
अरि की सेना ललकार रही
तेरे सुत पर कर वार रही
छा रहे युद्ध के बादल हैं
मंडराते क्रूर काल दल हैं
हिन्द का हर सैनिक भी अब
तुझसे ही आस लगाता
जागो हे श्री ध्वजाधारिणी
जागो हे भारत माता ।
भरत भूमि के वीर योद्धा
करने को तैयार समर हैं
पर तेरे आशीष बिना वह
कैसे लड़े यह युद्ध अमर है
देकर प्रसाद जय का वीरों को
निश्चित करो विजय की गाथा
जागो हे श्री ध्वजा धारिणी
जागो हे भारत माता।
गंगा यमुना की धारा भी
करती तेरा आह्वान है
हिमगिरि का उत्तुंग शिखर भी
करता सौ सौ बार नमन है।
सरिता गिरि कानन भी कहते
तुझको अपना त्राता
जागो हे श्री ध्वजाधारिणी
जागो हे भारत माता।
रिपुदल का करने नाश उठो
बन अर्जुन का धनु बाण उठो
सिंहों सी विकट दहाड़ उठो
राणा की बन तलवार उठो
दुश्मनदल का संहार करो
फहराओ विजय पताका
जागो हे श्री ध्वजाधारिणी
जागो हे भारत माता ।
-आनंद प्रताप सिंह
इलाहाबाद विश्वविद्यालय
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