ज़िंदगी तो चार दिन की है !
कुछ दिन कैसे कट गए पता ही नहीं चला
जितने भी दिन बाकी है , वो पूरे मेरे है
जाने कितनी हसरतें अधूरी है
जाने कितने अरमान हथेली में है
जाने कितने ख्वाब बंद अंखियों में है
जाने कितनी ख्वाहिशों के परों को
बांध दिया था उस वक्त मैंने
एक -- एक अब पूरे होंगे
कमसे कम ये कसक तो न
होगी कि मैने चार दिन की पूरी
ज़िंदगी गवां दी !!