ज़िंदगी मुझे कभी मंज़िल तक पहुंचती ही नहीं
इक मोड़ खत्म होने वाला जब होता है
लगता है शायद अब मंज़िल से रूबरू हो जाऊंगी
पर ये भरम टूट जाता है जब इक नया मोड़
नज़र आता है
ये क्रम जाने कब से चला आ रहा है
मै निरंतर चले जा रही हूं इसी सोच के
साथ , अबकी बार इस मोड़ के खत्म होते ही
मंज़िल के साक्षात दर्शन होंगे
जाने कितने लोग राहें सफ़र में मिले
और बिछड़ गए , आज भी नए अजनबी
लोगों के साथ आगे बढ़ रही हूं
पर पर बिन उम्मीद के , न किसी से कोई वादा
न किसी से कोई अनुग्रह साथ चलने का
अगर उम्मीद है तो खुद से कि इक दिन
इस सफ़र को मंज़िल ज़रूर मिलेगी !!