गुड्डे - गुड़ियों का खेल न्यारा
एक की दुल्हन एक दूल्हा
बाकी बचे कुछ घराती कुछ बाराती
याद आया सबको कितना प्यार
होता बचपन ।
कूद - कूद कर खेलते बिल्ला फेंक
पोसम पार भाई पोसाम पार का खेल , खेल - खेल
में डालते सब को जेल ।
दौड़ - दौड़ कर खेलते कभी संकल
कभी खेलते परी पत्थर का खेल
कंचे इक्कठा कर भरते झोली
पतंगों के पीछे - पीछे भागती बच्चों की टोली
इक दूजे को पकड़ - पकड़ बन जाती थी रेल
चल मेरी गाड़ी छुक छुक -- छुक हो जाती थी
इक बढ़िया सैर।
बचपन प्यारा बचपन की हर बात प्यारी ।।