दर्द भी कुछ कम ना था प्यास भी लग रही
शरीर पे कई घाव थे रास्ते कुछ अजनबी
हौसला कितना बताऊँ जो फिर भी चलते जा रहे
आँखे भी ना खुल रहीं और क़दम ना उठ रहे
मर रहे थे प्यास से साँसे हलक में रुक रहीं
तिलमिलाते धूप से कहीं दूर तक ना छांव
सब दे रहे थे हौसला अब तो मंजिल भी दिख रही
आँखों को धुँधला दिख रहा था दूर एक सज़र भी है
अब तो मौत को चकमा दिया अब तो आब भी नज़र में है
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