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Amit Tiwari

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            दर्द भी कुछ कम ना था प्यास भी लग रही
        
                                                    
                            
शरीर पे कई घाव थे रास्ते कुछ अजनबी
हौसला कितना बताऊँ जो फिर भी चलते जा रहे
आँखे भी ना खुल रहीं और क़दम ना उठ रहे
मर रहे थे प्यास से साँसे हलक में रुक रहीं
तिलमिलाते धूप से कहीं दूर तक ना छांव
सब दे रहे थे हौसला अब तो मंजिल भी दिख रही
आँखों को धुँधला दिख रहा था दूर एक सज़र भी है
अब तो मौत को चकमा दिया अब तो आब भी नज़र में है

हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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8 वर्ष पहले
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