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हूँ माटी का मैं वरद पुत्र।

Amit premshanker

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हूँ माटी का मैं वरद पुत्र
        
                                                    
                            
निज मुखड़ा गढ़ना पड़ता है
जीवन पथ में ध्येयनिष्ठ को
खुद ही बढ़ना पड़ता है
धर्म युक्त संघर्ष शौर्य से
पर्वत चढ़ना पड़ता है
सुख चैन की बलि चढ़ाकर
महल छोड़ना पड़ता है
अपने प्रिय के खातिर
भारत-लंका जोड़ना पड़ता है
धनुष बाण योद्धा का भूषण
व्यूह तोड़ना पड़ता है
जनमानस कल्याण हेतु को
स्वयं से लड़ना पड़ता है
और मुझ जैसे श्रृंगार कवि को
ओज भी पढ़ना पड़ता है।
-अमित प्रेमशंकर
2 घंटे पहले
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