आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

हूँ माटी का मैं वरद पुत्र।

                
                                                         
                            हूँ माटी का मैं वरद पुत्र
                                                                 
                            
निज मुखड़ा गढ़ना पड़ता है
जीवन पथ में ध्येयनिष्ठ को
खुद ही बढ़ना पड़ता है
धर्म युक्त संघर्ष शौर्य से
पर्वत चढ़ना पड़ता है
सुख चैन की बलि चढ़ाकर
महल छोड़ना पड़ता है
अपने प्रिय के खातिर
भारत-लंका जोड़ना पड़ता है
धनुष बाण योद्धा का भूषण
व्यूह तोड़ना पड़ता है
जनमानस कल्याण हेतु को
स्वयं से लड़ना पड़ता है
और मुझ जैसे श्रृंगार कवि को
ओज भी पढ़ना पड़ता है।
-अमित प्रेमशंकर
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर