इन धुँओं का क्या है रे
ये सबकी आँखे भर देगें
मेरे मौत पर हँसने वालो
की भी आँखे भर देगें।
मुझे लगेगा रो रहें सब
मेरे जाने के गम में
कहीं गलतफहमी न ये फिर
हो जाए मेरे मन में।
इसलिए बरसों से सूखी
जमा रखे लकड़ी बीस मन
किसी ढोंगियों को न तभी
करना पड़े भारी ये मन।
और दिखावे के आँसू से
हृदय ये छलनी न हो
हे आई, मुंबा देवी
हे माते जननी जय हो।
- अमित प्रेमशंकर