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बीस मन सूखी लकड़ी

Amit premshanker

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            इन धुँओं का क्या है रे
        
                                                    
                            
ये सबकी आँखे भर देगें
मेरे मौत पर हँसने वालो
की भी आँखे भर देगें।

मुझे लगेगा रो रहें सब
मेरे जाने के गम में
कहीं गलतफहमी न ये फिर
हो जाए मेरे मन में।

इसलिए बरसों से सूखी
जमा रखे लकड़ी बीस मन
किसी ढोंगियों को न तभी
करना पड़े भारी ये मन।

और दिखावे के आँसू से
हृदय ये छलनी न हो
हे आई, मुंबा देवी
हे माते जननी जय हो।
- अमित प्रेमशंकर
4 घंटे पहले
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