तुमसे प्रेम करना
जैसे किसी ख़ामोश नदी के किनारे बैठना—
जहाँ कुछ कहना ज़रूरी नहीं,
बस तुम्हारा होना ही
काफ़ी लगता है।
मैंने तुम्हें चाहा
किसी उम्मीद की तरह नहीं,
बल्कि उस दुआ की तरह
जिसे माँगने के बाद
भूल जाते हैं…
कि माँगा क्या था।
तुम मिले तो लगा
प्रेम शायद साथ चलने का नाम है,
फिर तुम दूर हुए
तो समझ आया—
प्रेम तो वो है
जो दूरी में भी
कम नहीं होता।
तुम्हें पाने की ज़िद नहीं है,
बस तुम्हारी मुस्कान
मेरी दुआओं में बनी रहे—
इतनी-सी ख़्वाहिश है।
और अगर कभी
मेरी याद तुम्हें छू जाए,
तो उसे रोकना मत…
समझ लेना,
किसी ख़ामोश शाम में
मेरा प्रेम
तुम्हें याद कर रहा है।
क्योंकि कुछ प्रेम
कहानियाँ नहीं बनते,
वे बस
दिल में उतर जाते हैं—
और फिर
उम्रभर वहीं रहते हैं।