भीड़ में खड़े होकर भी,
अक्सर अकेला होता है इंसान,
चेहरों की इस दुनिया में
कहाँ मिलता है कोई अपना पहचान।
हर कोई आगे बढ़ने की जल्दी में,
किसी को किसी की ख़बर नहीं,
हज़ारों आवाज़ें साथ होती हैं,
फिर भी दिल की सुनता कोई नहीं।
कुछ चेहरे रोज़ मिलते हैं,
कुछ उम्रभर साथ चलते हैं,
मगर वक़्त की इस भीड़ में
कितने सच में अपने निकलते हैं।
भीड़ हमें रास्ते तो देती है,
पर मंज़िल नहीं बताती,
कभी-कभी ख़ुद से मिलने के लिए
इंसान को भीड़ से दूर जाना पड़ता है।
मैंने भीड़ में रहकर जाना—
अकेलापन लोगों की कमी नहीं,
बल्कि उस एक शख़्स की कमी है
जिसके सामने ख़ामोशी भी
बात कर सके।