आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

भीड़ में लोग

                
                                                         
                            भीड़ में खड़े होकर भी,
                                                                 
                            
अक्सर अकेला होता है इंसान,
चेहरों की इस दुनिया में
कहाँ मिलता है कोई अपना पहचान।

हर कोई आगे बढ़ने की जल्दी में,
किसी को किसी की ख़बर नहीं,
हज़ारों आवाज़ें साथ होती हैं,
फिर भी दिल की सुनता कोई नहीं।

कुछ चेहरे रोज़ मिलते हैं,
कुछ उम्रभर साथ चलते हैं,
मगर वक़्त की इस भीड़ में
कितने सच में अपने निकलते हैं।

भीड़ हमें रास्ते तो देती है,
पर मंज़िल नहीं बताती,
कभी-कभी ख़ुद से मिलने के लिए
इंसान को भीड़ से दूर जाना पड़ता है।

मैंने भीड़ में रहकर जाना—
अकेलापन लोगों की कमी नहीं,
बल्कि उस एक शख़्स की कमी है
जिसके सामने ख़ामोशी भी
बात कर सके।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 hours ago

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर