अगर मैं नदी होता,
तो शायद किसी मंज़िल की तलाश न करता,
बस बहता रहता…
जहाँ रास्ते मिलते,
वहीं कुछ पल ठहर जाता।
पहाड़ों से निकलता,
तो उनकी ख़ामोशी अपने साथ लाता,
शहरों से गुजरता,
तो लोगों की कहानियाँ सुनता,
और गाँवों के पास पहुँचकर
किसी बच्चे की हँसी में
थोड़ा-सा ठहर जाता।
अगर मैं नदी होता,
तो किसी किनारे को
अपना कहकर बाँधता नहीं,
जो मेरे साथ चलना चाहे,
उसके साथ बहता,
और जो दूर जाना चाहे,
उसे चुपचाप जाने देता।
मेरे भीतर
कई पत्थर होते,
जिनसे टकराकर भी
मैं अपना रास्ता बनाता।
कभी शांत होता,
कभी बेक़रार,
कभी आँखों जैसा साफ़,
तो कभी बारिश की तरह
बेकाबू।
और जब कोई पूछता—
“आख़िर जाना कहाँ है?”
तो मैं मुस्कुराकर कहता—
“मुझे नहीं मालूम…
बस इतना जानता हूँ
कि रुकना मेरी फ़ितरत नहीं।”
अगर मैं नदी होता,
तो समंदर में जाकर भी
अपना सफ़र खत्म न मानता,
क्योंकि मुझे मालूम होता—
ख़त्म होना भी
किसी नई शुरुआत का
एक और नाम है।