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एक शायर, एक नज़्म

Amit Mamgain

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            वही मासूम-सी आँखें, वही मासूम-सी सूरत,
        
                                                    
                            
अगर बच्चों में मेरे अक्स तेरा ढल गया जानाँ...

तो समझ लेना कि इस दुनिया के सबसे ख़ूबसूरत पल,
हमारी मोहब्बत का हिस्सा बन गए जानाँ।

अगर उनमें मेरी आवारा सोच का कुछ रंग उतरा,
तो वो अल्फ़ाज़ बनकर कई दिलों में उतर जाएँगे।

मेरी तरह ही तन्हाइयों से गुफ़्तगू करके,
वो अपने दर्द को लिखेंगे, शायद शायर कहलाएँगे।

मगर जो तेरी सादगी उनकी आँखों में उतर आई,
तो उनकी ख़ामोशी में भी नग़्मे मुस्कुराएँगे।

कोई लिखेगा नहीं उनको, वो ख़ुद ही एक नज़्म होंगे,
जहाँ वो पाँव रखेंगे, मौसम गीत गुनगुनाएँगे।

शायद किसी हसीं दिन ये मुक़द्दर रंग लाएगा,
तेरा हाथ मेरे हाथों में हक़ीक़त बनकर आएगा।

जब हमारी मोहब्बत को वक़्त एक चेहरा देगा,
कोई शायर बनेगा, कोई नज़्म कहलाएगा।

— अमित ममगाईं
4 घंटे पहले
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