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पर्दे के पीछे का सच

Amit Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            पर्दे के पीछे का सच
        
                                                    
                            

ढोंग रच रहे नेता को
धन का हर प्रसंग याद है,
दर्द किसी का याद नहीं—
बस अपनी कहानी याद है।

मुरझाए हुए फूलों को
जो खिलाने का दावा कर ठग गया,
समझ लो—वो कोई और नहीं,
उसी व्यवस्था का चेहरा है,
जो वादों के पीछे छिपा है।

वित्त मंत्री भी वही बना,
जिसने जितना अधिक लूटा,
उतना ही बड़ा कहलाया;
जिसकी उदासी अपनी नहीं,
मुस्कुराहट ने ही
हर किसी को छलाया।

पर्देदारों की बातें अब
कहाँ रह गईं पर्दे में?
चेहरे उजागर हो गए हैं
सत्ता के अंधेरे में।

अपना भाव वहीं गिरा है,
जहाँ अपना ही भाई गिर पड़ा;
फिर भी कुछ लोग पूछते हैं—
“आख़िर कसूर किसका था?”

कसूर उस मौन का भी है
जो सच देखकर चुप रहा,
कसूर उस भीड़ का भी है
जो हर छल पर विश्वास करता रहा।

मगर याद रखो—
हर रात के बाद सवेरा आता है,
हर झूठ के बाद सच
एक दिन सामने आता है।

जो आज आँसू छिपाकर
सच की राह पर चल रहे हैं,
कल वही इतिहास लिखेंगे;
क्योंकि कुर्सियाँ बदलती रहती हैं,
मगर इंसानियत का दीप
सदियों तक जलता है।

- आचार्य अमित
2 महीने पहले
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