‘हम’…
दिल के अरमान भी
अब तेरी रहगुज़र से,
कुछ यूँ भटक गए हैं…
मानो हम भी किसी ख़याल के,
हमख़याल हो चले हैं।
दुश्वारियाँ कहूँ या मजबूरियाँ तुम्हें,
अब जो भी है मेरी ज़िंदगी में,
बस यही कुछ हिस्सेदारियाँ रही हैं…
न आँखों का पानी सूखा है,
न मैंने शर्म बेच खाई है,
मेरी बेहयाई में भी अक्सर,
तुम्हारी ही निशानियाँ रही हैं।
रोता बहुत है दिल मेरा,
तेरी ग़मज़दा यादों के मौसम में,
एक अजीब-सी नमी ठहरी है,
मेरी ख़ुशियों के हर आलम में…
मेरे पास कुछ तो तुम्हारा है
जो तुम नहीं हो,
मगर सब तुम-सा है,
मेरे पहलू में
तेरे नाम की,
बस यही चंद
परेशानियाँ रही हैं।
मैंने ख़ुदा से,
ईश्वर से,
जब भी ज़िक्र तेरा किया है,
जिस भी दहलीज़ पर
सजदा किया,
वहाँ ख़ुद को ही
खड़ा पाया है…
शायद इश्क़ का
यही फ़लसफ़ा है,
या रूह का कोई
अनकहा रिश्ता,
जिसे तुझमें तलाशता रहा,
वो मेरे ही भीतर
कहीं ज़िंदा रहा है।
वह नूर है या बेनूर है,
मेरे पास है या
मुझसे कोसों दूर है,
तेरी जो भी यादें हैं,
वही अब मेरा
इकलौता सरमाया हैं…
तुझे पाने की चाहत में,
ख़ुद को खोकर मैंने,
इस ज़िंदगी से बस
इतना ही पाया है।
अब तुम नहीं हो…
लेकिन अब मैं भी कहाँ रहा?
तेरे जाने के बाद इस दिल में,
पहले जैसा कुछ भी कहाँ रहा…
कुछ ख़्वाब बिखर गए,
कुछ ख़्वाहिशें ख़ामोश हो गईं,
कुछ साँसें जीना सीख गईं,
कुछ धड़कनें उदास हो गईं।
मगर वक़्त ने
एक बात सिखाई है,
कि हर टूटन में भी
एक गहराई है…
जो दर्द कभी
रूह पर बोझ था,
उसी ने आज
जीने की राह दिखाई है।
अब तेरी कमी से
शिकायत ज़रा कम है,
और ख़ुद से मिलने का
सिलसिला जारी है…
तेरी यादें अब भी
मेरे साथ हैं ज़रूर,
मगर अब ख़ुद से भी
मेरी गहरी यारी है।
अब तुम नहीं हो,
और शायद मैं भी पहले-सा नहीं,
मगर इस बिछड़ने की कहानी में,
सब कुछ खोया भी तो नहीं…
बस इतना मयस्सर हुआ है कि
तन्हाई ने मुझे ख़ुद से मिलाया है,
तेरे हिस्से का दर्द सहते-सहते,
मेरा कुछ हिस्सा
अब ‘हम’ हो गया है।
और अब… जो रिश्ता
कभी सिर्फ़ दर्द से था,
वह कुछ कम हो गया है,
ज़ख़्म अभी भी हैं,
मगर उनमें उम्मीद का
मरहम हो गया है…
मैंने तुझे खोकर भी,
अपने भीतर कुछ
अनमोल पा लिया है,
इश्क़ ने मुझे तोड़ा ज़रूर,
मगर उसी टूटन ने मुझे
फिर से जीना सिखा दिया है।
-आचार्य अमित