प्यार में डूबे आलू को लौक गई लौकी की मुस्काई,
लुभा कर लौकि ने उसकी करा दी टमाटर से वेवफाइ
कद्दू-कटहल ने भी कर दी, दो रिश्तों की कटाई,
जुदा कर घोल दिया उनकी जिन्दगी मे खटाई।
दो रिश्तों में आ गई इतनी बड़ी खाई,
टमाटर-आलू में हो गई कइ महीनो की जुदाई।
सब्ज़ी-बाग में लगे लम्बे कतार,
आलू भटक रहा सरे-बाज़ार।
सब जगह ढूँढा,उसने टमाटर को घूम-घूम,
जाने कहाँ हो गई, उसकि टमाटर उससे गुम।
'टमाटर! टमाटर!' पुकारे आलू,
"आ भी जाओ, अब न बनेंगे कभी चालू।"