आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

टमाटर! टमाटर!' पुकारे आलू,

                
                                                         
                            प्यार में डूबे आलू को लौक गई लौकी की मुस्काई,
                                                                 
                            
लुभा कर लौकि ने उसकी करा दी टमाटर से वेवफाइ

कद्दू-कटहल ने भी कर दी, दो रिश्तों की कटाई,
जुदा कर घोल दिया उनकी जिन्दगी मे खटाई।

दो रिश्तों में आ गई इतनी बड़ी खाई,
टमाटर-आलू में हो गई कइ महीनो की जुदाई।

सब्ज़ी-बाग में लगे लम्बे कतार,
आलू भटक रहा सरे-बाज़ार।

सब जगह ढूँढा,उसने टमाटर को घूम-घूम,
जाने कहाँ हो गई, उसकि टमाटर उससे गुम।

'टमाटर! टमाटर!' पुकारे आलू,
"आ भी जाओ, अब न बनेंगे कभी चालू।"
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर