न कोई गिला, न कोई शिकवा,
क्योंकि शिकवे के लिए भी तो
ज़ुबान की तासीर होनी चाहिए।
वह तो बस लहरों के साथ बहती है
और लहरों में ही खो जाना चाहती है।
अगर उसके पास भी आवाज़ होती,
तो वह समंदर से उसकी खामोशी का हिसाब माँगती,
किनारे पर आकर इंसानों से पूछती—
"आखिर मेरा कसूर क्या है?"
पर यहाँ तो न्याय की तराजू पर भी
आवाज़ें तौली जाती हैं,
आवाज़ें जो कागज़ पर लिख सकती हैं,
आवाज़ें जो दीवारों को फाड़ सकती हैं।
बेज़ुबान की चीख तो
सिर्फ पानी के बुलबुले की तरह होती है,
जो हवा में मिलते ही फूट जाती है!