है विशाल नेत्र ढाल, खींच रहे हैं डोरे लाल।
आंखों में भड़कता जैसे जंगलों में ज्वाल माल।
देख क्रोध शक्ति का त्रिनेत्र शांत शांत है।
लगाए अंग भस्म को उमापति अशांत है।1
कंठ के हलाहलो में आग बुझ गई कहां।
मिजते हथेलियां में शंभू खो गए कहां।
है त्रिलोकनाथ के कमजोर आज बागडोर।
हो अधीर देखते हैं आज यूं धारा की ओर।2
धन्य धन्य वीर है,ये वीरों की कहानियां।
सर काटे हैं,धड़ लड़े हैं,धन्य है जवानियां।
मौत को भी मात दे ललकारते पछाड़ते।
गीदड़ों के प्राण सुखे,सैन्य जब दहाड़ते।3
राज्य हो साम्राज्य हो,अधीन मृत्यु मान है।
चाल है कुटिल रानी चहती स्वराज्य है।
सैन्य वस्त्र धारती है,चंडिका का नाम ले।
चख रही है मातृभूमि,लाल रक्त स्वाद ले। 4
पीछे पीठ पुत्र बांध राज्य का विचार लेके।
मुख में लगाम खींच हाथों में तलवार लेके।
जल रही चिताएं चारों ओर श्मशान में।
कूद पड़ी महारानी युद्ध के मैदान में।5
झुंड के हैं झुंड मुंड आज बिखरे पड़े।
ये तीर तलवार तेग खंड खंड हो पड़े ।
चम-चम चमक रही तलवार तेज धार की।
हैं प्रशंसा हो रही हैं एक एक वार की।6
शत्रु भी ये बोलते,ये वीर हैं वीरांगना।
ये नर नहीं,ये नारी है, ये शक्ति की है साधना।
गर्भ टूटता है, आज पुरुष स्वाभिमान का।
ये दर्द झेलती है कैसे? घाव है डरावना।7
हैं कुशल वीरांगना खेलती कटार से।
लती छांट गरदानों को तेज तलवार से।
फुटते फुहार आज पिच पिच धार आज।
हो रही जमीन से हैं,खून की बौछार आज।8
कौन जाएगा समीप बह रही तरंग में।
वेरी देख-देख दंग,रानी है उमंग में।
जीतती है गढ़ किले ग्वालियर के गांव को।
बह रहे हैं रक्त,रक्त से ही,धो रही है घाव को।9
मौत का पैग़ाम फैल बढ रहा है, हर तरफ।
रक्त जो बिछें पड़े हैं कालिका को है अरप।
धड़कनों की धाक बढ़ रही है धक धक।
जैसे-जैसे बढ़ रही है,सैन शत्रु की तरफ।10
है अधिर शत्रु वीर, कपकपाती है शरीर।
रोम-रोम हो खड़े अकांड को पुकारते।
प्रकांड दिव्य तेज है,ये आत्मा अजर अमर।
जिधर भी देखती नजर उधर प्रलय प्रकोप है।11
प्रवीण शत्रु वीर है,की कह रहे वैराग्य लो
मौत बढ़ रही है जैसे हो प्रदीप अग्नि लौ।
कह रहे हैं शत्रु एक दूसरों की आंख देख।
अभी भी वक्त साथ है भाग लो भाग लो।12
- अमरनाथ जायसवाल