यूँ सामना अपना हुआ कइयों तूफान से
हम हैं कि सीना तान के रहे हैं शान से
लिखा खुदा ने क्या ही इन लकीरों में
पढ़ रहा ज़माना इनको इतने ध्यान से
आज भी ताजा है स्वाद जेहन के कोने
बाबूजी चीज खाने की लाते दुकान से
उल्फत के समंदर में गहरे डूब जाओगे
देखो एक बार तुम भी जाके जान से
तारों से टिमटिमाते दीप देख ये लगा
रोशनी का पर्व आया आसमान से
देखते हैं हम उसे अक्सर जो ख्वाब में
रब्त गहरी इतनी अपनी उस मकान से
आलोक कुछ रहता नहीं पछतावे के सिवा
जहर बुझा तीर चला हो जुबान से
-आलोक