विज्ञापन

जा रहे हैं भरने वो पानी की थैलियां

Alok Sharma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कोई किताब हैं ये क्या तेरी हथेलियाँ
        
                                                    
                            
रेखाएं इनमें हैं ये या लिखी पहेलियाँ

देख तितलियों को गुलशनों में ये लगे
निकली हैं सैर करने को रंगों की देवियाँ

रिसती ही जा रही है रेत सी ये जिन्दगी
कनपटी पे दिख रहीं हैं सफ़ेदियां

रौनकों से सजी गलियाँ शहर की
त्यौहार मनाती हुई जो हों सहेलियाँ

कर रहे हैं क्वार में अब अब्र वापसी
जा रहे हैं भरने वो पानी की थैलियां

होता है तर देख इन्हें रोज कलेजा
चाशनी में डूबी हुई ये जलेबियां

आलोक श्मशान में उस रोज जो गया
सब बयान कर रहीं खाक की ढेरियां
-आलोक
6 घंटे पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Manju Sharma

3561 कविताएं

View Profile