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जा रहे हैं भरने वो पानी की थैलियां

                
                                                         
                            कोई किताब हैं ये क्या तेरी हथेलियाँ
                                                                 
                            
रेखाएं इनमें हैं ये या लिखी पहेलियाँ

देख तितलियों को गुलशनों में ये लगे
निकली हैं सैर करने को रंगों की देवियाँ

रिसती ही जा रही है रेत सी ये जिन्दगी
कनपटी पे दिख रहीं हैं सफ़ेदियां

रौनकों से सजी गलियाँ शहर की
त्यौहार मनाती हुई जो हों सहेलियाँ

कर रहे हैं क्वार में अब अब्र वापसी
जा रहे हैं भरने वो पानी की थैलियां

होता है तर देख इन्हें रोज कलेजा
चाशनी में डूबी हुई ये जलेबियां

आलोक श्मशान में उस रोज जो गया
सब बयान कर रहीं खाक की ढेरियां
-आलोक
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3 घंटे पहले

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