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तुम खोजना मुझे जन,गण ,मन में

alok azad

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            तुम खोजना मुझे,
        
                                                    
                            
जन,गण,मन में,

जब मैं किसी पुल से,
लटका दिया जाता हूँ,
ताकि मेरी शरीर से रिसता लहू,
ना करे दूषित तुम्हारी,
सड़कों कि पवित्रता,

जिस सड़क की पहली ईट और रेत में,
सना है जून की दुपहरी में,
मेरे माथे से गिरा पसीना,
औऱ जिसकी अस्तित्व की आख़िरी डोर,
ख़त्म हो जाती है,
किसी ताक़तवर कि अट्टालिका में जा कर .....

तुम खोजना मुझे,
जन, गण, मन में,

जब मेरे शऱीर का रक्तस्राव,
बना देता है मेरे जिस्म को,
मैला- मलिन औऱ उपेक्षित,
औऱ मेरे दैहिक स्पर्श से,
सड़ने लगती है रोटी कि मधुमास,

जब मेरे देह से निकला लहू,
सींचता है तुम्हारे सृजन को,
औऱ धमनियों में तुम्हारी,
पलने लगता है श्रेष्ठता का ज्वार,
औऱ न्यायालय के कटघरे में,
मुझे मिलता है ताड़ना का अधिकार....

तुम खोजना ,
मुझे जन गण मन में...

जब एक भीड़,
बांध देती है मेरे दोनों हाथ,
औऱ मुझसे मांगा जाता है,
मेरे वतनपरस्ती का सबूत,
औऱ मेरी हर एक चीख़ के साथ,
होता है "भारत जिंदाबाद" का आवाहन...

औऱ मेरी सांसों के ख़त्म होने के साथ,
'भारत जिंदाबाद' का आवाहन,
औऱ तेज होता है..
अंततोगत्वा मेरी सांसे हार जाती हैं,
और भारत जीत जाता है.....

तुम खोजना मुझे,
जन, गण, मन में,
और देखना कि तुम्हारे,
जन गण मन का अधिनायक,
किसी पुल से लाश बन कर लटका हुआ है....।

आलोक आज़ाद


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