यमुना तट पर बजे बसुरिया ,
गोपी दौड़ी दौड़ी जायँ ।
चाँद बिखेरे पूरी शोभा ,
कान्हा रहस रचाये जायँ ।।
मैं भी जाना चाहूँ उस यमुना तट पर ,
जहाँ कान्ह की बजती बसुरिया हो।
मैं भी चाहूँ उस रज में लोटूँ ,
जहं पर रहस रचाया हो।.
आज भी चाहूँ प्रेम रस में डूबूँ ,
पाषाण हृदय में प्रेम रस रिसता नहीं।
' लाल ' की लालसा धरी रही ,
कभी प्रेम का अंकुर फूटा नहीं।।
--अशर्फी लाल मिश्र ,अकबरपुर , कानपुर।
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