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यमुना तट पर बजे बसुरिया

                
                                                         
                            यमुना तट पर बजे बसुरिया ,
                                                                 
                            
गोपी दौड़ी दौड़ी जायँ ।
चाँद बिखेरे पूरी शोभा ,
कान्हा रहस रचाये जायँ ।।

मैं भी जाना चाहूँ उस यमुना तट पर ,
जहाँ कान्ह की बजती बसुरिया हो।
मैं भी चाहूँ उस रज में लोटूँ ,
जहं पर रहस रचाया हो।.

आज भी चाहूँ प्रेम रस में डूबूँ ,
पाषाण हृदय में प्रेम रस रिसता नहीं।
' लाल ' की लालसा धरी रही ,
कभी प्रेम का अंकुर फूटा नहीं।।

--अशर्फी लाल मिश्र ,अकबरपुर , कानपुर।


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7 वर्ष पहले

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