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नीति के दोहे मुक्तक

AL Mishra

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            पवन
        
                                                    
                            

शीतल मंद पवन सदा, सब को अधिक सुहाय ।
वही पवन अति वेग से , नहि काहू मन भाय।।1।।

भाषा

गरम बात से खिन्न मन, गरम वात से गात ।
दोनों से तन मन दुखी , दिन होय या रात।।2।।

अपनों के मध्य

पशु भी खुश हो जाते हैँ, पाकर अपना झुण्ड ।
जो खुश होते नहि दिखें , वे हैं शिला खण्ड।।3।।

- अशर्फी लाल मिश्र , अकबरपुर, कानपुर
 
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4 वर्ष पहले
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