आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

नीति के दोहे मुक्तक

                
                                                         
                            पवन
                                                                 
                            

शीतल मंद पवन सदा, सब को अधिक सुहाय ।
वही पवन अति वेग से , नहि काहू मन भाय।।1।।

भाषा

गरम बात से खिन्न मन, गरम वात से गात ।
दोनों से तन मन दुखी , दिन होय या रात।।2।।

अपनों के मध्य

पशु भी खुश हो जाते हैँ, पाकर अपना झुण्ड ।
जो खुश होते नहि दिखें , वे हैं शिला खण्ड।।3।।

- अशर्फी लाल मिश्र , अकबरपुर, कानपुर
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक
4 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर