पवन
शीतल मंद पवन सदा, सब को अधिक सुहाय ।
वही पवन अति वेग से , नहि काहू मन भाय।।1।।
भाषा
गरम बात से खिन्न मन, गरम वात से गात ।
दोनों से तन मन दुखी , दिन होय या रात।।2।।
अपनों के मध्य
पशु भी खुश हो जाते हैँ, पाकर अपना झुण्ड ।
जो खुश होते नहि दिखें , वे हैं शिला खण्ड।।3।।
- अशर्फी लाल मिश्र , अकबरपुर, कानपुर
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