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मेरे बलमा के नखरे बड़े बड़े

AL Mishra

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मेरे बलमा के नखरे बड़े बड़े ,
        
                                                    
                            
मैं पुकार रही हूँ खड़े खड़े।

बचपन बीता यौवन बीता ,
बीता सारा जीवन।

वाणी मेरी क्षीण हुई है ,
क्षीण हुआ है तन।।

आओ बलमा पकड़ो बांह ,
पूरन कर दो मेरी चाह।

बलमा छोड़ो अपने नखड़े ,
मैं पुकार रही हूँ खड़े खड़े।।

उलझा हूँ तृष्णा में ,
पड़ा हुआ माया के बंधन।

हृदय हमारा करता क्रंदन ,
दया विचारो हे जगबन्दन।।

भाई बन्धु मेरे काम न आवें ,
एक आस बची है सजना की।

आँखें मेरी पंथ निहारे,
राह देखती प्रियतम की।।

आओ प्रियतम छोड़ो नखड़े ,
मैं पुकार रही हूँ खड़े खड़े।

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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