मेरे बलमा के नखरे बड़े बड़े ,
मैं पुकार रही हूँ खड़े खड़े।
बचपन बीता यौवन बीता ,
बीता सारा जीवन।
वाणी मेरी क्षीण हुई है ,
क्षीण हुआ है तन।।
आओ बलमा पकड़ो बांह ,
पूरन कर दो मेरी चाह।
बलमा छोड़ो अपने नखड़े ,
मैं पुकार रही हूँ खड़े खड़े।।
उलझा हूँ तृष्णा में ,
पड़ा हुआ माया के बंधन।
हृदय हमारा करता क्रंदन ,
दया विचारो हे जगबन्दन।।
भाई बन्धु मेरे काम न आवें ,
एक आस बची है सजना की।
आँखें मेरी पंथ निहारे,
राह देखती प्रियतम की।।
आओ प्रियतम छोड़ो नखड़े ,
मैं पुकार रही हूँ खड़े खड़े।
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