विज्ञापन

घाट घाट का पानी पिया

AL Mishra

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अफ्रीकी ट्रेन में धक्के खाये ,
        
                                                    
                            
फिर भी मोहन निराश नहीं।
न्याय मंदिर में जज ने कहा,
सिर पर होगी पगड़ी नहीं।।

आंदोलन "चम्पारण" का ,
या फिर हो "भारत छोड़ो"।
घाट घाट का पानी पिया,
गांधी का "दांडी मार्च" हुआ।।

हाथ में जिनके लाठी ,
कमर में धोती आधी।
घाट घाट का पानी पिया,
गांधी कहलाये राष्ट्र पिता ।।

- अशर्फी लाल मिश्र,अकबरपुर, कानपुर

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें
5 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Anita Dasani

16 कविताएं

View Profile

Ankit Kumar

10522 कविताएं

View Profile