मैं अपनी जीत की कहानियाँ नहीं लिखूँगा। मैं लिखूँगा थके हुए कंधों का सच,
जो हर दिन जिम्मेदारियों का बोझ उठाकर भी मुस्कुराना नहीं भूलते।
मैं लिखूँगा उस इंसान को, जो हर मुश्किल में हंसकर कह देता है “सब ठीक है”,जबकि उसके अंदर हजारों अनकहे तूफान चल रहे होते हैं।
दुनिया को दिखती है उसकी हिम्मत, पर मैं उसकी खामोशी लिखूँगा…वो खामोशी जो हर रात तकिये के सहारे टूट जाती है।
उस ज़ख्मी स्वाभिमान की कहानी लिखूँगा। लिखूँगा वो पल,जब इंसान अंदर से बिखर चुका होता है,
फिर भी बाहर से चट्टान बना रहता है…सिर्फ इसलिए क्योंकि कुछ रिश्तों की उम्मीदें उस पर टिकी होती हैं।
और हाँ…मैं लिखूँगा वो रातें भी,जहाँ नींद नहीं, सिर्फ सोच होती है…
जहाँ दर्द नहीं दिखता, पर हर सांस में महसूस होता है।
अगर लिख पाया कुछ, तो खुद को ही लिखूँगा…
अपनी रूह के हर ज़ख्म को, अपनी खामोश लड़ाइयों को,
और उस मुस्कान को भी, जो हर हाल में टूटने से खुद को बचा लेती है।