एक संवेदनशील कविता
विकास की अंधी दौड़ में,
किसका आशियाना छूट गया?
लोहे की पटरी बिछते-बिछते,
प्रकृति से नाता टूट गया।
जिन शाखों पर पीढ़ियाँ पलीं,
जहाँ चहकी थीं सुबह-सवेरें,
उन पेड़ों की साँसें गिनतीं,
अब मशीनों की क्रूर नज़रें।
छह हज़ार वृक्षों की छाया,
पाँच हज़ार परिंदों का घर,
किसने पूछा उन बेज़ुबानों से,
कहाँ बसोगे उजड़ने पर?
कहते हैं, पेड़ लगा देंगे,
हरियाली फिर लौटाएँगे।
पर जो घोंसले उजड़ गए,
क्या वे भी वापस लाएँगे?
इन तोतों को क्या ख़बर,
इंसाँ के कितने रूप!
कहीं दया की शीतल छाया,
कहीं स्वार्थ की तपती धूप।
जो कल तक दाना डाल रहे,
वे आज उजाड़ें नीड़।
कैसी अद्भुत सभ्यता है,
कैसी विकास की भीड़!
वाह रे मानव! तेरी प्रगति,
कैसा अद्भुत न्याय रचाया!
पहले छीना घर परिंदों का,
फिर संरक्षण-पाठ पढ़ाया!
तोते बेचारे क्या जानें,
इंसाँ की दोहरी पहचान।
हाथों में दाना भी रखता,
और छीन लेता आसमान!
मेट्रो दौड़े, नगर सँवारे,
प्रगति का सम्मान रहे।
पर हर पंछी के हिस्से में,
थोड़ा-सा आसमान रहे।
विकास वही जो जीवन सँवारे,
न किसी का संसार उजाड़े।
पेड़ महज़ लकड़ी नहीं हैं,
इनमें कितने जीवन पलते!
कल जब सूनी शाखें होंगी,
मौन खड़े होंगे वन-उपवन।
‘अनपढ़’ पूछेगा मानव से,
कहाँ गया वह मधुर गुंजन?
— अखिलेश जोशी ‘अनपढ़’