अस्सी साल उम्र मिल जाती,
आधी रात नींद में जाती।
बचपन और बुढ़ापा बीते,
चिंता में दिन-रात हैं रीते।
धन के पीछे मत लड़ जाना,
सब कुछ यहीं छोड़ है जाना।
मानव तन जो तुमने पाया,
वही धन्य है जग ने अपनाया ॥१॥
शब्द बहुत पर मौन है प्यारा,
श्वेत रंग मन का उजियारा।
व्रत रखने से सेहत सुधरे,
भीतर झाँको, भ्रम सब टरें।
आत्मा की आवाज सुनो तुम,
नेक राह जीवन की चुनो तुम।
भीतर जो हो स्वाभिमाना,
अभिमान को दूर भगाना॥२॥
बड़ों पास जब बैठो भाई,
धन्यवाद दो सुख की गाई।
कामकाज पर जाओ जब तुम,
लाचारों को भूल ना जाना तुम।
तंदुरुस्ती सबसे बड़ा धन,
रोगी की पीड़ा समझो मन।
साँसें चलती हैं जो सीने में
धन्य भाग हैं तब जीने में॥३॥
जिंदा हो तो जीवन मानो,
मौत सत्य है इसको जानो।
दीन-दुखी का दुख हर लेना,
परोपकार ही सच्चा गहना।
प्यार भरी नैया से तरना,
लोक-कल्याण सदा ही करना।
'अनपढ़' सबका मंगल गावे,
सुखी रहे जग, सब सुख पावे॥४॥
-अखिलेश जोशी ‘अनपढ़’