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पंच-दीप महोत्सव: ज्योति-पर्व की पंचामृत गाथा

Akhil Dadhich

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जब कार्तिक की कृष्ण निशा में, तारे भी शरमा जाते हैं,
        
                                                    
                            
तब माटी के लघु दीपक ही, नभ का अभिमान मिटाते हैं।
पाँच पगों में पूर्ण हुई यह, तम से लेकर ज्योति की यात्रा,
हर पग पर इक कथा खिली है, हर लौ में इक नव मात्रा।

उधर देहरी पर बैठी माँ, हर दिन उँगली पर गिनती है,
फ़ोन की हर घंटी पर उसकी, साँस ज़रा-सी थमती है।
पिता कभी फाटक तक जाते, कभी घड़ी को तकते हैं,
"गाड़ी कहाँ तक पहुँची होगी?", खुद से ही बस कहते हैं।
परदेस गए उन पंछियों को, उनके घर की माटी बुला रही,
बूढ़ी आँखें राह बिछाकर, आस की नई बाती जला रही।

प्रथम दीप: धनतेरस (आरोग्य, समृद्धि एवं मिलन का आवाहन)

क्षीरसागर के मंथन से जब, उठा अमृत का स्वर्ण-कलश,
धन्वंतरि प्रकटे धरती पर, लेकर जीवन का नव-सरस।
बोले, "निरोगी काया ही है, सबसे पहला, सबसे बड़ा धन,
स्वर्ण-रजत तो आनी-जानी, स्वस्थ रहे जो, वही है जन।"
आँगन में यम के नाम का, एक दीप धरो दक्षिण-दिशा,
अकाल मृत्यु का भय हर ले, सौंपे जीवन को नव-आशा।
तभी द्वार पर दस्तक गूँजी, सुनकर"माँ पापा! हम आ गए!"
माँ के हाथ से छूटा जो बर्तन, नैन अचानक से भर गए।
पिता ने बाँहों में भर लीं, बरसों की सब अश्रु मे दूरियाँ,
बोले, "आज मिला है असली धन, मिट गईं मजबूरियाँ।"

द्वितीय दीप: नरक चतुर्दशी (अहंकार के दहन का पर्व)

नरकासुर का दंभ बढ़ा जब, बंदी हुईं कई सहस्र नारियाँ,
सत्यभामा संग कृष्ण चले, गूँजी रण में विजय-कारियाँ।
अंधकार का अंत हुआ तब, मुक्त हुई पीड़ित मानवता,
यही सिखाता पर्व हमें, हारे सदा ही मानवता से दानवता।
उबटन से तन निर्मल कर लो, दीपों से हो मन उजियारा,
भीतर बैठे नरकासुर को, आज जला दो, तज अँधियारा।
माँ ने उबटन हाथ में लेकर, बच्चों का माथा सहलाया,
बड़े हुए थे जो बरसों में, फिर बचपन लौट के आया।
हँसी-ठिठोली, चुहल पुरानी, घर का कोना-कोना गूँजा,
सूना आँगन भर-भर आया, सन्नाटा हर पल को झूँझा।

तृतीय दीप: दीपावली (राम-आगमन एवं लक्ष्मी-पूजन)

चौदह बरस का वनवास काट, लौटे जब रघुकुल-भूषण,
सरयू तट पर उमड़ पड़ा, अयोध्या का जन-जन, कण-कण।
अमावस की उस काली रात में, दीप-शिखा ने चाँद उगाया,
हर देहरी पर फिर तारे उतरे, हर आँगन उत्सव बन आया।
लक्ष्मी-गणपति पूजन होता, खील-बताशे, गाते मंगल-गान,
सुख-समृद्धि-बुद्धि की देवी, करती सबका ही कल्याण।
यह रात नहीं केवल दीपों की, विजय है धर्म-प्रकाश की,
असत्य पर सत्य की जय है, हर निराशा पर आस की।
जैसे राम की राह निहारे, माँ कौशल्या की जैसी आँखें थीं,
वैसे ही इस घर की माँ की, हर साँस प्रतीक्षा-साखें थीं।
आज सभी हैं साथ खड़े, पूजा की थाली एक संग सजी,
माँ-पिता के मुख पर देखो, पूर्णिमा-सी आभा उसमे रची।
दीप जले तो घर ही क्या, हर मन में नव उजियारा हुआ,
परिवार के संग इस रात में, जीवन भी अपना सारा हुआ।

चतुर्थ दीप: गोवर्धन पूजा (प्रकृति एवं अपनों के प्रति कृतज्ञता)

इंद्र का जब मद जो बढ़ा, बरसे मेघ प्रलय फिर बनकर,
कान्हा ने कनिष्ठा पर थामा, गिरिराज को सहज उठाकर।
सात दिवस तक ब्रजवासी, छाँव में निर्भय सहज मुस्काए,
इंद्र भी लज्जित हुआ, झुका, श्रीकृष्ण की महिमा को गाए।
अन्नकूट भोग सजा है,सिखलाया गौमाता का मान करो,
जो देती है अन्न, जल, छाया, उस धरती का सम्मान करो।
सबने मिलकर थाली बाँटी, माँ ने अपने हाथ बना खिलाया,
वही पुराना स्वाद रसोई का, बरसों बाद लौट कर जोआया।
पिता की बातों की गठरी में, बचपन की कितनी है कहानी,
सब बच्चे बैठे सुनते ही जाते, आँखों में भर आया पानी।

पंचम दीप: भाई दूज (स्नेह-सूत्र का अमर बंधन)

यम के द्वारे यमुना आई, तिलक लगाया भाल पर,
भाई का मन भर आया, स्नेह के उस उपहार पर।
वर दिया यमराज ने, "जो बहन के घर आएगा,
भय न होगा मृत्यु का, वह चिरायु हो जाएगा।"
रोली, अक्षत, मिश्री, मेवा, थाली में सजता प्यार,
बहन की आँखों में झलकता, भाई के हित मंगल-संसार।
भाई-बहन को साथ देख, माँ-बाप के नैना छलके,
जो सपना बरसों से पाला, आज सामने आ दमके।
पर विदा की बेला आई, माँ ने आँचल से मुँह ढाँपा,
पिता ने हँसकर हाथ हिलाया, पर भीतर कुछ टूट-सा काँपा।

पाँच दिनों की यह दीपमाला, जीवन का पूरा दर्शन है,
स्वास्थ्य, विजय, प्रकाश, कृतज्ञता, प्रेम, सच्चा वंदन है।
पाँच दिवस परिवार के संग, बीते जैसे पल में सपना,
पर जीवन भर साथ रहेगा, यादों का यह उजला अपना।
हर दीवाली जब-जब आए, माँ-पिता की आँखें नम हों,
बच्चों के मन में भी बसते, ये दिन सदा सुखद, अनुपम हों।
तमसो मा ज्योतिर्गमय, उपनिषद् की वाणी सदा रहे बने ,
अपनों संग दीप जलाए, उसकी ही सच्ची दीवाली मनानी।
23 घंटे पहले
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