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उम्मीद

Ajeet Yadav

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कल की उम्मीद में आज को मरते हुए देखा
        
                                                    
                            
अजीत ना जाने कितने घर उजड़ते हुए देखा

मुहब्बत को ही मुहब्बत नज़र अाती है
वर्ना जिस्म को जिस्म से बिछड़ते हुए देखा

ख़ुद पर यक़ीन हो तो कुछ भी नामुमकिन नहीं
पत्थर में भी हरियाली पनपते हुए देखा

ख़ुश रहना मुतमइनी का है फलसफ़ा
शहशांह को भी अक्सर सिसकते हुए देखा

ग़लत को ग़लत बोलना है हिम्मत का काम
ख़ुदगर्ज़ी में दानिशमंद को पीछे भटकते हुए देखा

रात हो गई अजीत चलो सो जायें.....
कई बार सुब्ह का ख़्वाब संवरते हुए देखा

अजीत यादव


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7 वर्ष पहले
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