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ग़ज़ल

Ajeet Yadav

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
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तुम्हें क्या पता क्यों शहर छोड़ आया
ना घर के लिए, अपना घर छोड़ आया

सिर्फ़ लहरों पर चलने की आदत हमारी
जिधर से भी गुज़रा, इक लहर छोड़ आया

आँधियों से मैं डरकर अगर लौट जाऊँ
इससे मुश्किल है क्या जब जिगर छोड़ आया

बिछायें थे जो तुमने राहों में पत्थर
उन सभी पर मैं इक-इक ठोकर छोड़ आया

हमें क्या डुबाओगे तुम ऐ अजीत
किनारे पर जब ख़ुद सागर छोड़ आया

अजीत यादव


- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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