तुम्हारी याद का मौसम अजब सा हो गया है,
बिना बरसे ही दिल में पानी भर गया है।
तुम्हारी बात में वो नर्मी कहाँ से आती है,
कि सूखा दिल भी मेरा दरिया बन गया है।
तुम्हारे साथ चलने का ख्याल भर ही काफी,
ये रास्ता भी जैसे गुलशन बन गया है।
तुम्हें सोचा तो दुनिया कुछ बदल सी जाती,
हर एक लम्हा नया सावन बन गया है।
ना जाने कौन सी खुशबू है तेरे लहजे में,
मेरा हर दर्द भी चंदन बन गया है…
— अजीत पड़वार