बहुत अद्भुत है यह जमाना,
किसी का आना और किसी का जाना;
क्या समझता है इंसान खुद को,
जबकि अंत में सबका एक ही ठिकाना।
ऊँच-नीच, जाति-पाँति और भेद-भाव,
सब फैले यहां नहीं इनका अभाव;
हैं सब एक ही प्रकृति की संतति,
है फिर भी यहां यह कैसा अलगाव।
खोकर सारी नैतिकता और सुध-बुध को, मानता सदैव श्रेष्ठ खुद को;
मद मस्त मानव बिन मानवता,
ढूंढ़ता हर पल सिर्फ घड़ी एक सुखद को।
नित नए यह कुकर्म करता ,
नहीं फिर भी इसका उदर भरता;
सिर्फ चन्द पल की तृप्ति के लिए,
जाने क्या-क्या अपराध करता।
सुख- शान्ति, व चैन से न सोने देते,
पर उन्नति होने न देते;
जलाकर खुद को ईर्ष्या से ये मानव,
दूसरो को अच्छे बीज बोने न देेते।
रहूँ केवल मैं यहाँ है यह कैसी भावना,
जाने कहां खो गई सारी सद्भावना;
पर पीड़ा पहुंचाकर प्रेम पाना,
नही दिखती मुझे अब कुछ इसकी सम्भावना।
देखता कमजोर को तू हेय दृष्टि से,
उसका भी उदगम है एक ही सृष्टि से;
बरसा क्या छोड़ देती है गरीब का क्षेत्र,
बूंदे गिरती हर जगह सम बादल वृष्टि से।
वह सख्स जो कार पर हर रोज चलता, साइकिल सवार को कुछ अलग ही वह समझता;
साइकिल से ही बढ़ती है कार की प्रतिष्ठा,
यह समझने की यहाँ कोशिश कहाँ इंसान करता।
न करो हनन किसी की स्वतन्त्रता का ,
सिखादो पाठ सबको मित्रता का;
छोड ऊँच-नीच और बैर-भाव,
नारा लगाओ हर जगह सिर्फ एक,
एकता का।
अजीत सिंह यादव
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