दिल! तुम धड़कते क्यों नहीं
टूटे भी तो किसके ख़ातिर
जो समझा तुमको कभी नहीं
मेरे ही हो पर मेरे सुनते क्यों नहीं
दिल! तुम धड़कते क्यों नहीं।
था वो मुसाफ़िर चंद दिनों का
अपनी राह चुना और चला गया
एक तुम हो शीशे-सा टूटे पड़े हो
समय का हर पहर गुज़र रहा
तुम एक ही जगह अटके पड़े हो
उसने आज भूलकर कल चुना
तुम भी कल चुनते क्यों नहीं
दिल! तुम धड़कते क्यों नहीं।
नहीं-नहीं एक बात बताओ
क्या मिल जाएगा, तुम जीत जाओगे?
या वो ही मंज़िल थी जो पा लोगे
अपनी ही राहों में क्यों भटक रहे हो
वो गर खुश है तो तुम भी खुश हो
गमों के सागर से, बाहर निकलते क्यों नहीं
दिल! तुम धड़कते क्यों नहीं।
एक समां था जो गुज़र गया
ज़िन्दगी नहीं थी जो सर पकड़े हो
बाहर देखो तो सही
उस एक के अलावा
तुम्हारे अपने कितनेेे हैं
घूँट पी रहे हो जो अंदर
पिचकारी मारकर मुस्कुराओ
जीवन का आंनद उठाओ
जब इतनी समझ है तुममें
तो खुद को समझाते क्यों नहीं
दिल! तुम धड़कते क्यों नहीं।
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