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ज़िंदगी … एक अजब, पहेली सी है

Ajay Singh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ज़िंदगी … एक अजब, पहेली सी है
        
                                                    
                            
जितना जाना है इसे, उतना उलझा हूँ मैं।

किताबें सिखाती रहीं , उम्र भर सलीके जीने के
पर तज़ुर्बों की सीझ में, हर बार ही उलझा हूँ मैं ।

सोचता था, कि सुलझा लूँगा, हर एक गिरह,
पर हरेक मोड़ पर, खुद से ही उलझा हूँ मैं।

ढूँढता रहा, जवाब, जिन सवालों के ता-उम्र,
वो सवाल भूल कर, ये किधर बहका हूँ मैं।

ये जो धागे हैं, उम्मीदों के, बड़े कच्चे हैं,
बुनते पिरोते इन्हें, कई कई बार टूटा हूँ मैं।

राह-ए -ज़िंदगी में मिले, मुझे, अपने तो बहुत,
पर हर भरी महफ़िल में, आज भी तन्हा हूँ मैं ।

कोशिश तो बहुत की, पर वो सिरा ना मिला,
जिसे पकड़ के कहूँ, कि हाँ अब सुलझा हूँ मैं।
एक महीने पहले
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