मत बनो धरा पर भार ! त्यागो छुद्र कामनाएं !
झुके आसमान, तुम्हारे निज संघर्ष के आगे ,
उठो, जन्म दायनी माँ की पूर्ण करो भावनायें !
हृदय विशाल कर, उदारता की स्व-पहचान दो ,
ध्येय में परहित सर्वोपरि हो, वृक्ष से संज्ञान लो !
शील-सदाचार की, नभ में बहें सुगंधित हवायें ,
वैभवी बनो इतना, ईर्ष्या द्वेष छुद्र दिखने लगे ,
स्वदीप जलाओ, जो दूसरों के तम हरने लगे !
तुम्हारे सत्कर्म से, समग्र भेद रहित धारा बहे ,
हर जुबान, सदा तुम्हारी शुचिता की गाथा कहे !
जगाओ मानव धर्म की, सुप्त पड़ी संभावनाएं ,
सहिष्णुता से पूर्ण करो, मानवीय हर कामनायें !
पल दो पल की, जय-जय कार को, न स्थान दें ,
क्षण, प्रतिक्षण मानव मूल्यों को, नई पहचान दें !
जाओ तुम, जब धरा से, हर आँख से आँसू बहे ,
तब युग, तुम्हारे पुन: आगमन की प्रतीक्षा सहे !