आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

राष्ट्र का आदर्श नेतृत्व.

                
                                                         
                            मत बनो धरा पर भार ! त्यागो छुद्र कामनाएं !
                                                                 
                            
झुके आसमान, तुम्हारे निज संघर्ष के आगे ,
उठो, जन्म दायनी माँ की पूर्ण करो भावनायें !
हृदय विशाल कर, उदारता की स्व-पहचान दो ,
ध्येय में परहित सर्वोपरि हो, वृक्ष से संज्ञान लो !
शील-सदाचार की, नभ में बहें सुगंधित हवायें ,
वैभवी बनो इतना, ईर्ष्या द्वेष छुद्र दिखने लगे ,
स्वदीप जलाओ, जो दूसरों के तम हरने लगे !
तुम्हारे सत्कर्म से, समग्र भेद रहित धारा बहे ,
हर जुबान, सदा तुम्हारी शुचिता की गाथा कहे !
जगाओ मानव धर्म की, सुप्त पड़ी संभावनाएं ,
सहिष्णुता से पूर्ण करो, मानवीय हर कामनायें !
पल दो पल की, जय-जय कार को, न स्थान दें ,
क्षण, प्रतिक्षण मानव मूल्यों को, नई पहचान दें !
जाओ तुम, जब धरा से, हर आँख से आँसू बहे ,
तब युग, तुम्हारे पुन: आगमन की प्रतीक्षा सहे !



 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर