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पर योद्धा को समझौता मंज़ूर कहाँ है?

Ajay pratap

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कुछ वादे हैं, कुछ कसमें हैं,
        
                                                    
                            
जिनको निभाना बाकी है।
कुछ हालातों की मजबूरी है,
जो आगे बढ़ने देती नहीं है।

पर योद्धा को समझौता मंज़ूर कहाँ है?
जीतेगा ये वीर कभी तो,
आख़िर हार कहाँ टिकती है?

समय-चक्र का कुप्रभाव यही है,
जो आया है हिस्से में।
वक़्त कभी तो जो बदलेगा,
तब गाएँगे गीत विजय के।

कभी तो जीत भी होगी हमारी,
इस हार के आगे।
ये मुमकिन है नहीं, सर न झुके
इस सुल्तान के आगे।

आज हम जो घिरे हैं चार दीवारों में,
कल सल्तनत भी बनेगी
इसी नाम से।

समझते जो कुछ नहीं मुझको,
कभी ऐतबार भी करेंगे।
ख़्वाबों को हक़ीक़त करने,
आज काँटों पे भी चलेंगे।

दर्द-ए-दिल का भला हम
दिखाएँ किसे?
आज उतरे हैं शब्द कागज़ पे जो,
क्या पता यहीं से दिशा इनको मिले।

यही तो जीवन है विद्यार्थी का,
पराजय से अजेय के
सफ़र तक का नाम है इसका।

 
एक महीने पहले
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