आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

पर योद्धा को समझौता मंज़ूर कहाँ है?

                
                                                         
                            कुछ वादे हैं, कुछ कसमें हैं,
                                                                 
                            
जिनको निभाना बाकी है।
कुछ हालातों की मजबूरी है,
जो आगे बढ़ने देती नहीं है।

पर योद्धा को समझौता मंज़ूर कहाँ है?
जीतेगा ये वीर कभी तो,
आख़िर हार कहाँ टिकती है?

समय-चक्र का कुप्रभाव यही है,
जो आया है हिस्से में।
वक़्त कभी तो जो बदलेगा,
तब गाएँगे गीत विजय के।

कभी तो जीत भी होगी हमारी,
इस हार के आगे।
ये मुमकिन है नहीं, सर न झुके
इस सुल्तान के आगे।

आज हम जो घिरे हैं चार दीवारों में,
कल सल्तनत भी बनेगी
इसी नाम से।

समझते जो कुछ नहीं मुझको,
कभी ऐतबार भी करेंगे।
ख़्वाबों को हक़ीक़त करने,
आज काँटों पे भी चलेंगे।

दर्द-ए-दिल का भला हम
दिखाएँ किसे?
आज उतरे हैं शब्द कागज़ पे जो,
क्या पता यहीं से दिशा इनको मिले।

यही तो जीवन है विद्यार्थी का,
पराजय से अजेय के
सफ़र तक का नाम है इसका।

 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर